बंधु-बहनो
!मेरा निवेदन है कि आप ज्योतिष को जानें या न जानें और ज्योतिष को स्वयं
मानें या न
मानें किंतु ज्योतिष को बिना प्रॉपर ढंग से पढ़े ज्योतिष सही है या गलत
इसका फैसला करने की आदत छोड़ दें !क्योंकि ज्योतिष एक शास्त्र है और शास्त्र
हम आप सभी के हैं इसलिए हम सभी लोगों को मिलजुलकर इसकी रक्षा करनी होगी
!ये अपने पूर्वजों की धरोहर हैं ।
आपको सरकार और कानून पर इतना तो विश्वास करना ही चाहिए कि यदि ज्योतिष
में सच्चाई न होती तो बनारस हिंदू यूनिवर्सिटी जैसे बड़े संस्थानों में
ज्योतिष सब्जेक्ट का पाठ्यक्रम क्यों होता ज्योतिष शिक्षण के लिए अन्य
सब्जेक्ट की तरह डिपार्टमेंट क्यों होता उसके रीडर प्रोफेसर क्यों होते और
उनकी सैलरी लाखों में क्यों होती !केवल BHU ही नहीं देश के अन्य कई
प्रांतों में भी ऐसी यूनिवर्सिटीज सरकार ने चला रखी हैं । केवल इतना ही
नहीं अपितु ज्योतिष जैसे गंभीर सब्जेक्ट में दो पाठ्यक्रम हैं और दो विषयों
से एम. ए.(ज्योतिषाचार्य) और पीएचडी करने की व्यवस्था की गई है कहने का
मतलब कुछ तो ऐसा होगा कि सरकार ज्योतिष प्रशिक्षण पर करोड़ों रुपए महीने
खर्च कर रही है एक एक विश्व विद्यालय पर !यदि सच्चाई न होती तो इसका विरोध
करने के लिए लोग अब तक कोर्ट चले जाते और ज्योतिष डिपार्टमेंट बंद करवाने के आदेशपारित करवा लाते !ये तो बात रही कानून की !
बंधुओ !अब रही बात मान्यताओं और अनुभवों की
तो प्राचीन काल से ही ज्योतिष राजा महाराजाओं से लेकर आम जनता तक अपनी सच्चाई के कारण ही अत्यंत लोकप्रिय रहा है।
आप स्वयं सोचिए कि जब आधुनिक विज्ञान विकसित नहीं हुआ था तब भी ज्योतिष विज्ञान तो यहीं बैठे बैठे पूरे आकाश की तलाशी केवल
ज्योतिषगणित के बलपर ही तो लिया करता था आखिर सूर्य चन्द्र कब उगेंगे कब
अस्त होंगे न केवल सूर्य चन्द्र ग्रहणों के प्रारम्भ और समाप्ति का एक एक
सेकेंड एक्यूरेट टाईम पता लगा लेना अपितु सूर्य और चन्द्र मंडलों में किस
दिशा से ग्रहण प्रारम्भ होगा और सूर्य - चन्द्र मंडलों का कितना भाग
काला होगा ये तक यहीं बैठे बैठे पता लगा लेना अलग अलग शहरों में ये ग्रहण
कहाँ कितना और कैसा दिखाई पड़ेगा !केवल इतना ही नहीं भविष्य में आने वाले
ग्रहणों के विषय में सबकुछ पता लगा लेना क्या ये छोटी बात है आप ही सोचिए
कि इतनी विराट क्षमता वाला ज्योतिष शास्त्र विज्ञान नहीं तो क्या है !
जो लोग आकाश में जहाँ कभी गए नहीं केवल गणित के बल पर जब वहाँ की इतनी खबर
रखते थे तो जिस पृथ्वी पर रहते हैं उस धरती का क्या कुछ छिपा होगा उस
शास्त्र से !
वर्षा विज्ञान-
किस वर्ष कितनी वर्षा होगी इसका पता इसी गणित के बल पर बर्षों पहले लगा लिया जाता था उसी हिसाब से किसान अपनी फसलें बोने का चयन किया करते थे जिससे फसलों का नुकसान कम से कम होता था । वर्तमान आधुनिक मौसम विज्ञान दस पाँच दिन पहले लगा पाता है पूर्वानुमान !वो भी कितना एक्यूरेट होता है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी जी के बनारस जाने के लिए आयोजित दो बड़े कार्यक्रम केवल मौसम के कारण ही सन 2015 मैं कैंसिल करने पड़े थे जिन्हें करोड़ों रूपए खर्च करके संयोजित किया गया था !अब आप स्वयं कल्पना कीजिए जो मौसम भविष्य देश के प्रधान मन्त्री के एक आयोजन में मदद नहीं कर सका वो देश के किसानों के किस काम आएगा !किसानों को तो महीनों पहले फसलों के बोने आदि का चयन करना होता है उसके लिए कितना कारगर है ये मौसम विभाग स्वयं सोचिए !किंतु इतने पर भी उस मौसम विभाग को संचालित करने के लिए सरकार करोड़ों अरबों रूपए खर्च करती है किंतु "राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान" के तहत हम जिस मौसम सम्बन्धी विधा के पूर्वानुमान पर रिसर्च कर रहे हैं यदि वो आंशिक मदद करने में भी सफल होती है तो मैं सरकार से सहयोग की अपेक्षा करता हूँ !हमने कई पत्र लिखे किंतु कोई सुनवाई नहीं हुई।बंधुओ !फिर भी हम आपको भरोसा देते हैं कि आपलोगों के सहयोग से हम इस रिसर्च में सफल होंगे ।
वर्षा विज्ञान-
किस वर्ष कितनी वर्षा होगी इसका पता इसी गणित के बल पर बर्षों पहले लगा लिया जाता था उसी हिसाब से किसान अपनी फसलें बोने का चयन किया करते थे जिससे फसलों का नुकसान कम से कम होता था । वर्तमान आधुनिक मौसम विज्ञान दस पाँच दिन पहले लगा पाता है पूर्वानुमान !वो भी कितना एक्यूरेट होता है इसका अंदाजा आप इसी बात से लगा सकते हैं कि देश के प्रधानमंत्री श्री नरेंद्रमोदी जी के बनारस जाने के लिए आयोजित दो बड़े कार्यक्रम केवल मौसम के कारण ही सन 2015 मैं कैंसिल करने पड़े थे जिन्हें करोड़ों रूपए खर्च करके संयोजित किया गया था !अब आप स्वयं कल्पना कीजिए जो मौसम भविष्य देश के प्रधान मन्त्री के एक आयोजन में मदद नहीं कर सका वो देश के किसानों के किस काम आएगा !किसानों को तो महीनों पहले फसलों के बोने आदि का चयन करना होता है उसके लिए कितना कारगर है ये मौसम विभाग स्वयं सोचिए !किंतु इतने पर भी उस मौसम विभाग को संचालित करने के लिए सरकार करोड़ों अरबों रूपए खर्च करती है किंतु "राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान" के तहत हम जिस मौसम सम्बन्धी विधा के पूर्वानुमान पर रिसर्च कर रहे हैं यदि वो आंशिक मदद करने में भी सफल होती है तो मैं सरकार से सहयोग की अपेक्षा करता हूँ !हमने कई पत्र लिखे किंतु कोई सुनवाई नहीं हुई।बंधुओ !फिर भी हम आपको भरोसा देते हैं कि आपलोगों के सहयोग से हम इस रिसर्च में सफल होंगे ।
भूकंप विज्ञान -
इसी प्रकार भूकंप विज्ञान विभाग में हमने सूचना के अधिकार के तहत पूछा कि पिछले दस वर्षों में भूकंप का पूर्वानुमान लगाने में आप कितने कदम आगे बढ़ पाए हैं किंतु पता लगा कि दस वर्ष की तो छोड़िए अभी तक भूकंप संबंधी पूर्वानुमान लगाने की दिशा में कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पाई है । जब भूकंप आता है तो जमीन के अंदर की प्लेटों वाली बात दोहरा दी जाती है ,डेंजर जोन गिना दिए जाते हैं और अभी आफ्टर शॉक्स आते रहेंगे इसकी सूचना दे दी जाती है। बंधुओ ! केवल इतना बताने के लिए सरकार इस मंत्रालय पर यदि इतना खर्च करती है फिर भी भूकम्प के पूर्वानुमान की दिशा में यदि कोई जानकारी हाथ लगी ही नहीं तो भूकंप मंत्रालय और भूकम्प विभाग पर खर्च होने वाली अकूत संपत्ति का देश हित में और दूसरा उपयोग क्या है?मेरा अनुमान है कि सरकार इन विषयों पर करोड़ों अरबों रूपए खर्च करती होगी इसी आशा से "राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान" के तहत हम प्राचीन विज्ञान के द्वारा भूकंप सम्बन्धी विधा पर रिसर्च कर रहे हैं यदि इससे भूकंप का पूर्वानुमान लगाने सहयोग मिलने की आंशिक सम्भावना भी दिखती है तो हम सरकार से अपेक्षा करते हैं कि हमारा सहयोग किया जाना चाहिए !
इसी प्रकार भूकंप विज्ञान विभाग में हमने सूचना के अधिकार के तहत पूछा कि पिछले दस वर्षों में भूकंप का पूर्वानुमान लगाने में आप कितने कदम आगे बढ़ पाए हैं किंतु पता लगा कि दस वर्ष की तो छोड़िए अभी तक भूकंप संबंधी पूर्वानुमान लगाने की दिशा में कोई ख़ास प्रगति नहीं हो पाई है । जब भूकंप आता है तो जमीन के अंदर की प्लेटों वाली बात दोहरा दी जाती है ,डेंजर जोन गिना दिए जाते हैं और अभी आफ्टर शॉक्स आते रहेंगे इसकी सूचना दे दी जाती है। बंधुओ ! केवल इतना बताने के लिए सरकार इस मंत्रालय पर यदि इतना खर्च करती है फिर भी भूकम्प के पूर्वानुमान की दिशा में यदि कोई जानकारी हाथ लगी ही नहीं तो भूकंप मंत्रालय और भूकम्प विभाग पर खर्च होने वाली अकूत संपत्ति का देश हित में और दूसरा उपयोग क्या है?मेरा अनुमान है कि सरकार इन विषयों पर करोड़ों अरबों रूपए खर्च करती होगी इसी आशा से "राजेश्वरी प्राच्य विद्या शोध संस्थान" के तहत हम प्राचीन विज्ञान के द्वारा भूकंप सम्बन्धी विधा पर रिसर्च कर रहे हैं यदि इससे भूकंप का पूर्वानुमान लगाने सहयोग मिलने की आंशिक सम्भावना भी दिखती है तो हम सरकार से अपेक्षा करते हैं कि हमारा सहयोग किया जाना चाहिए !
चिकित्सा विज्ञान-
बीमारियाँ तीन प्रकार से होती हैं उनमें कुछ तुरंत के किए हुए कर्मों से होती हैं जैसे सर्दी लगेगी तो जुकाम होगा ही, छत से कूदेंगे तो चोट लगेगी ही इसके लिए तो चिकित्साविज्ञान के पास पर्याप्त औषधियाँ हैं किंतु इसमें ज्योतिष की भूमिका 25 प्रतिशत होती है क्योंकि सर्दी लगने से हर किसी को तो जुकाम नहीं हो जाता है और ऊँचाई से गिरने या एक्सीडेंट होने पर या भूकंप आदि आने पर कुछ लोग उन परिस्थितियों में बिल्कुल बाल बाल बच जाते हैं उन्हें खरोंच तक नहीं लगती है जिन परिस्थितियों में सुरक्षित बच पाना चिकित्सकीय दृष्टि से कतई संभव नहीं होता है ऐसी घटनाओं में बचे हुए लोगों के बचने के कारण पर रिसर्च किया जा सकता है !
बीमारियाँ तीन प्रकार से होती हैं उनमें कुछ तुरंत के किए हुए कर्मों से होती हैं जैसे सर्दी लगेगी तो जुकाम होगा ही, छत से कूदेंगे तो चोट लगेगी ही इसके लिए तो चिकित्साविज्ञान के पास पर्याप्त औषधियाँ हैं किंतु इसमें ज्योतिष की भूमिका 25 प्रतिशत होती है क्योंकि सर्दी लगने से हर किसी को तो जुकाम नहीं हो जाता है और ऊँचाई से गिरने या एक्सीडेंट होने पर या भूकंप आदि आने पर कुछ लोग उन परिस्थितियों में बिल्कुल बाल बाल बच जाते हैं उन्हें खरोंच तक नहीं लगती है जिन परिस्थितियों में सुरक्षित बच पाना चिकित्सकीय दृष्टि से कतई संभव नहीं होता है ऐसी घटनाओं में बचे हुए लोगों के बचने के कारण पर रिसर्च किया जा सकता है !
दूसरे प्रकार की बीमारियाँ वो हैं जो इसी जन्म में किए हुए पुराने कर्मों के कारण होती हैं ऐसी बीमारियाँ कोई
कर्म प्रतिकूल करने पर तुरंत न होकर बाद में होती हैं जैसे चीनी अधिक खाते
रहने से शुगर होती है बचपन से अधिक खाते रहने या ऊट पटांग आहार व्यवहार
शराब आदि नशा सेवन से इसी जन्म में कालांतर में बीमारियाँ होती हैं किंतु
ऐसा करने वाले सभी लोगों को तो नहीं होती हैं ऐसी परिस्थितियों में किसको
हो सकती हैं किसको नहीं और हो सकती हैं तो कब और किस वर्ष में इसका
पूर्वानुमान लगाने में ज्योतिष की बड़ी भूमिका होती है और ऐसी बीमारियाँ होने के बाद औषधियों से इसमें अधिक से अधिक पचास प्रतिशत ही लाभ हो पाता है ।
तीसरे प्रकार की वो बीमारियाँ होती हैं जो अपने द्वारा किए गए पिछले जन्म के कर्मों के कारण ही होती हैं जैसे पिछले जन्म में मैंने सर्पों को मारा है तो इस जन्म में सर्प काटेगा और यदि सर्प जागृत आदि हुआ तो उसके शाप के कारण इस जन्म में संतान नहीं होती है कोई बड़ी बीमारी लग जाती है ऐसे ही और तमाम प्रकार की पीड़ाएँ भोगनी पड़ती हैं ऐसी ही अन्य कर्मों से जुड़ी तमाम पीड़ाएँ होती हैं जिनमें ज्योतिष की भूमिका 75 प्रतिशत होती है और चिकित्सा विज्ञान 25 प्रतिशत में समिट कर बेबस होता है ऐसी परिस्थितियों में औषधियों की भूमिका केवल 25 प्रतिशत रह जाती है वो भी काम चलाऊ !
ऐसी बीमारियों के होने से पहले पूर्वानुमान यदि ठीक ढंग से लगा लिया जाए तो शुरुआत से ही आचार व्यवहार में संयम करके ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होने से काफी हद तक बचा जा सकता है इस विधा पर रिसर्च की जा सकती है ज्योतिष के द्वारा बचपन में ही यदि इसका पूर्वानुमान लगा लिया जाए तो इनसे बचने के लिए बचपन से ही भगवान शिव की आराधना एवं सर्प पूजा आदि करके भगवान की कृपा से भवितव्यता पर एक सीमा तक लगाम लगाई जा सकती है।ऐसी परिस्थितियोँ में ज्योतिष के द्वारा इन परिस्थितियों पर रिसर्च क्यों न की जाए !
आत्मज रोग -ऐसी परिस्थितियों में पूर्व जन्मों के कर्मों के प्रभाव से व्यक्ति को मुख से लेकर शरीर में कहीं कोई ऐसी विकृति हो जाए जिनसे शरीर में कोई दर्द नहीं होता और न इनकी दवा होती है किंतु ऐसे लोगों से देखने वाले लोग घृणा किया करते हैं ये आत्मज रोग होते हैं इन पर रिसर्च होनी चाहिए ।
रोग योग -कुछ समय होते हैं जिनमें यदि कोई सुई भी चुभ जाए तो वो बहुत भयानक रूप ले लेती है कोई नई बीमारी होने पर भी ऐसा ही समझा जाना चाहिए ऐसे समयों में प्रारम्भ हुए रोगों पर रिसर्च होनी चाहिए क्योंकि शुरुआत में ही यदि ऐसी बीमारियों की चिकित्सा प्रारम्भ हो जाए तो बहुत हद तक नियंत्रण किया जा सकता है ।
तीसरे प्रकार की वो बीमारियाँ होती हैं जो अपने द्वारा किए गए पिछले जन्म के कर्मों के कारण ही होती हैं जैसे पिछले जन्म में मैंने सर्पों को मारा है तो इस जन्म में सर्प काटेगा और यदि सर्प जागृत आदि हुआ तो उसके शाप के कारण इस जन्म में संतान नहीं होती है कोई बड़ी बीमारी लग जाती है ऐसे ही और तमाम प्रकार की पीड़ाएँ भोगनी पड़ती हैं ऐसी ही अन्य कर्मों से जुड़ी तमाम पीड़ाएँ होती हैं जिनमें ज्योतिष की भूमिका 75 प्रतिशत होती है और चिकित्सा विज्ञान 25 प्रतिशत में समिट कर बेबस होता है ऐसी परिस्थितियों में औषधियों की भूमिका केवल 25 प्रतिशत रह जाती है वो भी काम चलाऊ !
ऐसी बीमारियों के होने से पहले पूर्वानुमान यदि ठीक ढंग से लगा लिया जाए तो शुरुआत से ही आचार व्यवहार में संयम करके ऐसी परिस्थितियाँ पैदा होने से काफी हद तक बचा जा सकता है इस विधा पर रिसर्च की जा सकती है ज्योतिष के द्वारा बचपन में ही यदि इसका पूर्वानुमान लगा लिया जाए तो इनसे बचने के लिए बचपन से ही भगवान शिव की आराधना एवं सर्प पूजा आदि करके भगवान की कृपा से भवितव्यता पर एक सीमा तक लगाम लगाई जा सकती है।ऐसी परिस्थितियोँ में ज्योतिष के द्वारा इन परिस्थितियों पर रिसर्च क्यों न की जाए !
आत्मज रोग -ऐसी परिस्थितियों में पूर्व जन्मों के कर्मों के प्रभाव से व्यक्ति को मुख से लेकर शरीर में कहीं कोई ऐसी विकृति हो जाए जिनसे शरीर में कोई दर्द नहीं होता और न इनकी दवा होती है किंतु ऐसे लोगों से देखने वाले लोग घृणा किया करते हैं ये आत्मज रोग होते हैं इन पर रिसर्च होनी चाहिए ।
रोग योग -कुछ समय होते हैं जिनमें यदि कोई सुई भी चुभ जाए तो वो बहुत भयानक रूप ले लेती है कोई नई बीमारी होने पर भी ऐसा ही समझा जाना चाहिए ऐसे समयों में प्रारम्भ हुए रोगों पर रिसर्च होनी चाहिए क्योंकि शुरुआत में ही यदि ऐसी बीमारियों की चिकित्सा प्रारम्भ हो जाए तो बहुत हद तक नियंत्रण किया जा सकता है ।
डेंगू जैसे घातक ज्वर और ज्योतिष की भूमिका -
ऐसे ज्वरों के विषय में डेंगू का इलाज आम तौर पर चिकित्सकीय प्रक्रिया से किया जाता है, लेकिन इसे
दूसरे विषाणु-जनित रोगों से अलग कर पाना कठिन है। उपचार का मुख्य तरीका
सहायक चिकित्सा देना ही है, मुख से तरल देते रहना , नसों से भी तरल दिया जाता है,
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